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بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَٱلضُّحَىٰ ﴿١﴾
Wad duhaa
(ऐ रसूल) पहर दिन चढ़े की क़सम
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ ﴿٢﴾
Wal laili iza sajaa
और रात की जब (चीज़ों को) छुपा ले
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ ﴿٣﴾
Ma wad da'aka rabbuka wa ma qalaa
कि तुम्हारा परवरदिगार न तुमको छोड़ बैठा और (न तुमसे) नाराज़ हुआ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَلَلْءَاخِرَةُ خَيْرٌۭ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ ﴿٤﴾
Walal-aakhiratu khairul laka minal-oola
और तुम्हारे वास्ते आख़ेरत दुनिया से यक़ीनी कहीं बेहतर है
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ ﴿٥﴾
Wa la sawfa y'uteeka rabbuka fatarda
और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًۭا فَـَٔاوَىٰ ﴿٦﴾
Alam ya jidka yateeman fa aawaa
क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَوَجَدَكَ ضَآلًّۭا فَهَدَىٰ ﴿٧﴾
Wa wa jadaka daal lan fahada
और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَوَجَدَكَ عَآئِلًۭا فَأَغْنَىٰ ﴿٨﴾
Wa wa jadaka 'aa-ilan fa aghnaa
और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ ﴿٩﴾
Fa am mal yateema fala taqhar
तो तुम भी यतीम पर सितम न करना
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ ﴿١٠﴾
Wa am mas saa-ila fala tanhar
माँगने वाले को झिड़की न देना
- जुज़ 30 · पृष्ठ 596
وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ ﴿١١﴾
Wa amma bi ni'mati rabbika fahad dith
और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना