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بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلشَّمْسِ وَضُحَىٰهَا ﴿١﴾
Wash shamsi wa duhaa haa
सूरज की क़सम और उसकी रौशनी की
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلْقَمَرِ إِذَا تَلَىٰهَا ﴿٢﴾
Wal qamari izaa talaa haa
और चाँद की जब उसके पीछे निकले
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلنَّهَارِ إِذَا جَلَّىٰهَا ﴿٣﴾
Wannahaari izaa jallaa haa
और दिन की जब उसे चमका दे
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰهَا ﴿٤﴾
Wallaili izaa yaghshaa haa
और रात की जब उसे ढाँक ले
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلسَّمَآءِ وَمَا بَنَىٰهَا ﴿٥﴾
Wassamaaa'i wa maa banaahaa
और आसमान की और जिसने उसे बनाया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَٱلْأَرْضِ وَمَا طَحَىٰهَا ﴿٦﴾
Wal ardi wa maa tahaahaa
और ज़मीन की जिसने उसे बिछाया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَنَفْسٍۢ وَمَا سَوَّىٰهَا ﴿٧﴾
Wa nafsinw wa maa sawwaahaa
और जान की और जिसने उसे दुरूस्त किया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَىٰهَا ﴿٨﴾
Fa-alhamahaa fujoorahaa wa taqwaahaa
फिर उसकी बदकारी और परहेज़गारी को उसे समझा दिया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّىٰهَا ﴿٩﴾
Qad aflaha man zakkaahaa
(क़सम है) जिसने उस (जान) को (गनाह से) पाक रखा वह तो कामयाब हुआ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّىٰهَا ﴿١٠﴾
Wa qad khaaba man dassaahaa
और जिसने उसे (गुनाह करके) दबा दिया वह नामुराद रहा
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوَىٰهَآ ﴿١١﴾
Kazzabat Samoodu bi taghwaahaaa
क़ौम मसूद ने अपनी सरकशी से (सालेह पैग़म्बर को) झुठलाया,
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
إِذِ ٱنۢبَعَثَ أَشْقَىٰهَا ﴿١٢﴾
Izim ba'asa ashqaahaa
जब उनमें का एक बड़ा बदबख्त उठ खड़ा हुआ
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ ٱللَّهِ نَاقَةَ ٱللَّهِ وَسُقْيَٰهَا ﴿١٣﴾
Faqaala lahum Rasoolul laahi naaqatal laahi wa suqiyaahaa
तो ख़ुदा के रसूल (सालेह) ने उनसे कहा कि ख़ुदा की ऊँटनी और उसके पानी पीने से तअर्रुज़ न करना
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُم بِذَنۢبِهِمْ فَسَوَّىٰهَا ﴿١٤﴾
Fakazzaboohu fa'aqaroohaa fadamdama 'alaihim Rabbuhum bizambihim fasaw waahaa
मगर उन लोगों पैग़म्बर को झुठलाया और उसकी कूँचे काट डाली तो ख़ुदा ने उनके गुनाहों सबब से उन पर अज़ाब नाज़िल किया फिर (हलाक करके) बराबर कर दिया
- जुज़ 30 · पृष्ठ 595
وَلَا يَخَافُ عُقْبَٰهَا ﴿١٥﴾
Wa laa yakhaafu'uqbaahaa
और उसको उनके बदले का कोई ख़ौफ तो है नहीं